डाकिया फिर अटक गया
याद है अध्याय 1 वाली चिट्ठी?
चलिए, कहानी थोड़ी आगे बढ़ाते हैं।
आपने लिफ़ाफ़े पर लिखा, "जयपुर"। चिट्ठी जयपुर पहुँच गई। डाकिया साइकिल लेकर निकला। और शहर के बीचों-बीच खड़ा होकर सिर खुजाने लगा।
"जयपुर तो आ गया... पर जाऊँ किधर? यहाँ तो सैकड़ों मोहल्ले हैं!"
चिट्ठी शहर तक पहुँची, पर दोस्त तक नहीं।
पिछले अध्याय में हमने यही किया था। हमने ग्रह का शहर देखना सीखा, यानी राशि। आपने अपने चाँद की राशि लिखकर रखी भी है।
पर सिर्फ़ शहर से काम नहीं चलता। अब चाहिए मोहल्ला।
आकाश के मोहल्लों का नाम है — नक्षत्र (Nakshatra)।
आकाश के 27 मोहल्ले
पुराने ऋषियों ने आकाश-घड़ी को एक और तरीक़े से भी बाँटा।
12 बड़े टुकड़े तो थे ही, राशियाँ। उन्होंने उसी 360 डिग्री के गोले को 27 छोटे टुकड़ों में भी बाँटा। यही 27 टुकड़े नक्षत्र कहलाते हैं।
हर नक्षत्र कितना बड़ा हुआ? ज़रा हिसाब लगाएँ:
360 ÷ 27 = 13 डिग्री 20 मिनट
अरे रुकिए। डिग्री के भी मिनट होते हैं? हाँ! जैसे 1 रुपये में 100 पैसे होते हैं, वैसे 1 डिग्री में 60 मिनट होते हैं। घड़ी वाला मिनट नहीं, यह नाप वाला मिनट है। बस इतना याद रखिए: मिनट यानी डिग्री का छोटा भाई।
तो हर नक्षत्र = 13 डिग्री 20 मिनट। हर मोहल्ला एकदम बराबर नाप का।
पर 27 ही क्यों? न 25, न 30?
जवाब बड़ा प्यारा है। याद है, चाँद पूरे आकाश का चक्कर 27 दिन में लगाता है? तो चाँद रोज़ एक नक्षत्र में डेरा डालता है। एक दिन, एक मोहल्ला। 27 दिन, 27 मोहल्ले, और चक्कर पूरा!
नक्षत्रों के नाम भी आपने सुने होंगे, भले ध्यान न दिया हो। अश्विनी, भरणी, रोहिणी, मघा, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, मूल, श्रवण, रेवती... कुल 27 नाम हैं। सारे नाम एक साथ आपको इस अध्याय के पोस्टर में मिलेंगे। अभी रटने की ज़रूरत नहीं।
एक नाम ज़रूर जान लीजिए। आपका अपना नक्षत्र।
जन्म के समय चाँद जिस नक्षत्र में था, वह आपका जन्म-नक्षत्र कहलाता है। हमारे यहाँ सदियों से बच्चे का नाम इसी नक्षत्र के हिसाब से रखा जाता रहा है। हो सकता है आपके नाम का पहला अक्षर भी वहीं से आया हो!
और ध्यान दीजिए, जन्म-नक्षत्र में बात चाँद की हो रही है, किसी और ग्रह की नहीं। क्यों चाँद ही? क्योंकि चाँद मन का ग्रह है। याद कीजिए, हमारी मम्मी! और सबसे तेज़ चलने वाली सुई भी वही है। रोज़ नया मोहल्ला। इसीलिए चाँद का पता हर इंसान के लिए अलग-अलग बैठता है। KP में भी आगे चाँद बार-बार हीरो बनेगा।
हर मोहल्ले का एक मालिक
अब इस अध्याय की सबसे काम की बात।
हर मोहल्ले का कोई न कोई ख़याल रखने वाला होता है न? कोई प्रधान, कोई मुखिया।
वैसे ही हर नक्षत्र का एक मालिक ग्रह है। उसे नक्षत्र का स्वामी (Lord) कहते हैं।
अब गिनती कीजिए। नक्षत्र 27 हैं, और ग्रह 9। तो बँटवारा साफ़ है।
27 ÷ 9 = 3
हर ग्रह के हिस्से में तीन-तीन मोहल्ले आए। सूर्य के तीन, चाँद के तीन, शनि मास्टरजी के भी तीन।
और यह बँटवारा मनमर्ज़ी से नहीं हुआ। ग्रहों की एक पक्की लाइन है, एक तय क्रम, जो कभी नहीं बदलता:
केतु → शुक्र → सूर्य → चंद्र → मंगल → राहु → गुरु → शनि → बुध
पहला नक्षत्र (अश्विनी) केतु का। दूसरा (भरणी) शुक्र का। तीसरा सूर्य का... नौवें पर बुध आया, लाइन ख़त्म। फिर? फिर वही लाइन दोबारा शुरू! दसवाँ नक्षत्र फिर केतु का।
यही लाइन तीन बार घूमती है। 9 × 3 = 27। सारे मोहल्ले बँट गए।
अब एक ज़रूरी बात, ज़रा ध्यान से।
यह क्रम इस किताब की सबसे क़ीमती लाइन है। इसे रट लीजिए। क्यों? यह अभी नहीं बताएँगे, थोड़ा सब्र। बस इतना समझ लीजिए कि अगले ही अध्याय में यही लाइन एक जादुई चाबी बनेगी, और अध्याय 9 में यही लाइन आपको बताएगी कि ज़िंदगी में कौन-सा काम कब होगा।
पर रटें कैसे? नौ नामों की लाइन। भूल गए तो?
घबराइए मत। ट्रिक हाज़िर है।
रटने की ट्रिक: अम्मा की राशन-पर्ची
सोचिए, अम्मा ने बाज़ार भेजा है। हाथ में पर्ची थमाई है। पर्ची में 9 चीज़ें हैं:
केले, शुद्ध घी, सूजी, चावल, मूंग, राजमा, गुड़, शक्कर, बूंदी
पढ़ने में ही हलवे की ख़ुशबू आ रही है न? अब देखिए जादू। हर चीज़ का पहला अक्षर एक ग्रह छुपाए बैठा है:
| पर्ची की चीज़ | ग्रह |
|---|---|
| केले | केतु |
| शुद्ध घी | शुक्र |
| सूजी | सूर्य |
| चावल | चंद्र |
| मूंग | मंगल |
| राजमा | राहु |
| गुड़ | गुरु |
| शक्कर | शनि |
| बूंदी | बुध |
बस! अब आपको लाइन कभी नहीं भूलेगी। जब भी अटकें, मन में अम्मा की पर्ची पढ़ लीजिए। केले, शुद्ध घी, सूजी, चावल, मूंग, राजमा, गुड़, शक्कर, बूंदी।
एक और छोटी ट्रिक: लाइन को 3-3-3 में तोड़ लीजिए।
(केतु, शुक्र, सूर्य) · (चंद्र, मंगल, राहु) · (गुरु, शनि, बुध)
तीन-तीन के तीन डिब्बे। ज़ुबान पर चढ़ाने में आसानी रहती है।
अभी, इसी वक़्त, किताब बंद किए बिना, पर्ची को दो बार बोलकर पढ़िए। हो गया? अब किताब से नज़र हटाकर एक बार ग्रहों की लाइन सुनाइए। अटके नहीं? वाह! नहीं सुना पाए तो कोई बात नहीं। पोस्टर फाड़कर पढ़ाई की मेज़ पर चिपका लीजिए।
एक मोहल्ला, दो शहर?
चलते-चलते एक मज़ेदार पेच।
राशि 30 डिग्री की है। नक्षत्र 13 डिग्री 20 मिनट का। अब 30 में 13°20' पूरा-पूरा नहीं बैठता, है न?
इसका मतलब — कुछ मोहल्ले दो शहरों की सीमा पर पड़ते हैं। मोहल्ले का आधा हिस्सा इस शहर में, आधा उस शहर में। जैसे कोई गाँव दो राज्यों की सीमा पर बसा हो।
अभी इसे बस एक मज़ेदार बात की तरह जेब में रख लीजिए। अगले अध्याय में यही छोटा-सा पेच एक बड़े राज़ का दरवाज़ा खोलेगा।

आज का काम 3 मिनट का:
- sugraha.com पर अपनी कुंडली खोलो।
- ग्रह-सूची में चंद्र (Moon) की लाइन देखो। इस बार राशि के आगे उसका नक्षत्र भी लिखा मिलेगा। यही आपका जन्म-नक्षत्र है!
- उसी जगह नक्षत्र का स्वामी भी देखो।
- पिछले अध्याय वाले काग़ज़ पर, राशि के आगे अब यह भी लिखो: "नक्षत्र ____, स्वामी ____"।
- घर में पूछो, क्या आपका नाम जन्म-नक्षत्र के अक्षर से रखा गया था? मज़ेदार कहानियाँ निकलेंगी!
आकाश के 27 मोहल्ले हैं — हर नक्षत्र 13°20' का, हर एक का एक मालिक ग्रह, और मालिकों की लाइन पक्की: केले, शुद्ध घी, सूजी, चावल, मूंग, राजमा, गुड़, शक्कर, बूंदी!
- नक्षत्र कुल कितने हैं, और हर नक्षत्र कितना बड़ा है?
- अम्मा की पर्ची में "राजमा" किस ग्रह की याद दिलाता है?
- पक्की लाइन में शुक्र के ठीक बाद कौन-सा ग्रह आता है?